नज़रियाः मुस्लिमो को समझने की बेहद ज़रुरत, कि शतरंज की चालो का जवाब कुश्ती से नही दिया जाता

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नजरिया : आज के इस माहौल में वो ख़ौफ़ के साये में उखड़ा हुआ/अफरा-तफरी ओर दुश्वारियों से दो चार है। मेरा मानना है कि हमे मायूस हरगिज -हरगिज नही होना है। मायूसी कुफ्र है। लेकिन ये सच है कि आज के इस माहौल में हिंदुस्तान का मुस्लमान एक बुझता हुआ चिराग़ है। जिसकी लो तड़प तड़प कर दम तोड़ती हुई दिखाई देती है।

इतना ही नहीं इस माहौल से कुछ लोग हैं जिनके जज़्बात जिंदे होकर उफान पर है! जिन्हें इस हाल अहवाल पर गुस्सा है। हालात पर गुस्सा होना भी चाहिए। कियूंकि गुस्सा जिंदो को ही आता है। मुर्दे गुस्सा नही हुआ करते। मेरा मानना है कि इस गुस्से की परवरिस हो!इस गुस्से का उबाल में बदलने की आज जरूरत है! हा हा गुस्सा होना होगा।

आज लोगो को इस्लाम से नफरत नही है। शतरंज की चालो का जवाब कुश्ती से नही दिया जाता, कड़वी बात लगेगी! लेकिन सच यही है कि झोपड़ी से महलो तक बैठा मुसलमान अपने अपने तौर पर हर उस बुराई के बाजार को गर्म करने की बदतमीजी कर रहा है। जिस से इसके बुलंद किरदार को भारी नुकसान हुआ है. आज झोपड़ी में बैठकर जुआ खेलकर! ओर महलो में बैठ कर अय्यास होता ये बदहाल, मुसलमान कब गुस्सा होगा.

उन्होंने हमें मदरसे मकतब दिए आज उनकी मेहनत की बरकत से हम टोपी दाढ़ी ओर कलमा नमाज की शिनाख्त कर पाएं लेकिन आज ये बिगड़ता दस्तूर कदम कदम पर उगते उठते मदारिश कमीसन पर उगाया जा रहा चंदा जकात ओर खैरात के माल के गलत इस्तेमाल हमारे उलेमाओं के चेहरे से नूर को दूर कर रहा है। हमे सम्भलना और सम्भालना होगा, ये सही है कि हममें कुछ लोग हैं जो गलत है!लेकिन कम लोगो ने हम सब लोगो को शर्मिंदा कर रखा है

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