एनआरसी ड्राफ्ट पर कासमी ने कहा – ‘अपने ही लोगों की घुसपेठिया बताना सही नहीं’

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दिल्ली: असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर चल रहे विवाद को लेकर कांग्रेस नेता मोहम्मद उमर कासमी ने अपने ही देश के लोगों को घुसपेठिया बताने पर कड़ी आपत्ति जाहीर की है। उन्होने कहा कि वह भी ऐसे लोगों को घुसपेठिया बताना जिनके पूर्वजों ने न केवल देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया हो, बल्कि उन्होने असम के एक बड़े हिस्से को पूर्वी पाकिस्तान में जाने से रोका हो।

उन्होने कहा कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) में जिन 40 लाख लोगों का नाम नहीं आया है। उनमे जंगे आजादी के मुजाहिदीन की औलादे है। उनके रिश्तेदार है। इनमे वे लोग भी शामिल हैं। जो बंटवारे के वक्त न तो पाकिस्तान गए थे और नहीं उन्होने असम को पाकिस्तान में शामिल होने दिया। वरना आज असम का एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान यानि बांग्लादेश में होता। इतना ही नहीं इनके वंशज आज आर्मी सहित सरकारी नौकरियों के जरिए देश की सेवा कर रहे है। इन लोगों को देश की सेवा में दशकों का वक्त गुजर चुका है। कासमी ने कहा कि तीन-तीन दशकों से देश की सेवा करने वाले लोगों का नाम एनआरसी ड्राफ्ट में न होना अफसोसनाक है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि आर्मी में सेवा दे चुके अजमल हक, राज्य की इकलोती महिला मुख्यमंत्री रहीं सैयदा अनोवरा तैमूर, भारत के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद आदि इस बात के उदाहरण है। हालांकि न तो इन लोगों के और नहीं इनके परिजनो के नाम न होना एनआरसी में भारी विसंगतियों की और इशारा करते है। बावजूद बीजेपी नेताओं के अनाप-शनाप बयान आ रहे है। जो निंदनीय है।

उन्होने राजसमंद में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ‘राजस्थान गौरव यात्रा’ के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दिये गए बयान की भी आलोचना की। जिसमे उन्होने अपने ही देश के नागरिको को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताया। उन्होने सवाल किया कि 40.07 लाख आवेदकों में से अगर एक शख्स भी अपनी नागरिकता साबित कर देता है तो क्या बीजेपी अध्यक्ष उस शख्स से माफी मांगेगे ? कासमी ने दावा किया कि इन लोगों में से अधिकतर अपनी नागरिकता साबित करने में कामयाब होंगे। उन्होने आरोप लगाया कि एनआरसी के जरिए बीजेपी आगामी चुनावों में फायदा हासिल करना चाहती है।

कॉंग्रेस नेता ने कहा कि देश की सर्व्वोच अदालत ने ड्राफ्ट में शामिल न किए गए 40 लाख से ज्यादा लोगों के सबंध में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए क्योंकि अभी यह सिर्फ मसौदा ही है।जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच ने सूची से बाहर रखे गए लोगों को अपने दावे पेश करने के लिए पूरा मौका देने के बारे में कहा है। ऐसे में इन लोगों को घुसपेठिया कहना सरासर गलत है।

कासमी ने एनआरसी अपडेट प्रक्रिया में केंद्र से धार्मिक भेदभाव के आरोपो को गंभीरता से लेने की भी मांग की। उन्होने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था द्वारा नियुक्त चार सदस्यों द्वारा विदेश मंत्रालय को लिखे पत्र और मुस्लिम संगठनों की मांगों के संज्ञान लेने पर भी ज़ोर दिया। उन्होने कहा कि असम में मुसलमानों की आबादी क़रीब 34 फ़ीसदी है। उनमें अधिकतर बंगाली मुसलमान हैं जो बीते सौ सालों के दौरान यहां आकर आबाद हुए हैं। ये लोग बेहद ग़रीब, अनपढ़ और अप्रशिक्षित मज़दूर हैं। इन लोगों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव की शंका है। जिसे दूर किया जाना चाहिए।

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