मदरसे के स्टूडेंट्स के बीच MSO ने आयोजित किया जश्ने आज़ादी पर स्पीच कम्पीटीशन

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दिल्ली: कर्दमपुरी स्तिथ मदरसा गौसुल उलूम में मुस्लिम स्टूडेंट्स आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इंडिया के तत्वावधान और तंजीम उलेमा इस्लाम के समर्थन से “आज़ादी और उसकी अहमियत” पर एक स्पीच कम्पटीशन का आयोजन 11 अगस्त को किया गया, जिसमे मदरसे से 50 तथा स्कूल के 25 स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिया, प्रत्येक प्रतिभागी के लिए 3 मिनट का समय रखा गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश के मौलाना इन्किलाब चिश्ती उर्फ़ नूरी बाबा थे, उन्होंने सभी प्रतिभागियों को सर्टिफिकेट तथा टॉप 5 को ट्राफी से सम्मानित किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आज़ादी सभी को प्यारी होती है चाहे वो इन्सान हो या हैवान हो, परिंदा हो या जानवर, इसलिए हम सब को गर्व होना चाहिए कि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जो आजाद है, लेकिन हमको याद रखना चाहिए कि इस आज़ादी को हासिल करने के लिए हमारे पूर्वजो ने कितना संघर्ष किया और कितनी क़ुर्बानिया दीं है। सुभाष चन्द्र बोस, गाँधी जी, अशफाक़उल्ला खां ये तो सिर्फ चाँद नाम है इसी तरह हजारो लोगो ने इस आज़ादी के मूवमेंट में हिस्सा लिया तब जाकर हमको ये आज़ादी नसीब हुई , इसलिए हमको अपने देश के प्रति अच्छा नागरिक बनने का संकल्प करना चाहिए, समाज में मौजूद कुरीतियों से लड़ने का भी संकल्प करना चाहिए, देशप्रेम से ओतप्रोत होकर समाज में आपसी सौहार्द और भाईचारे के बढ़ावे के लये तत्पर रहना चाहिए।

कार्यक्रम के संयोजक और MSO पूर्वी दिल्ली के अध्यक्ष कामिल रज़ा ने हम आज भी अपने मुल्क के लिए जान देने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान में मदरसों ने सिर्फ उलूमे नबूवत की इशाअत और जिहालत व मूर्खता के जड़ों को उखाड़ फेंकने का काम ही अंजाम नहीं दिया है, बल्कि मुल्क के हित में भी इन मदरसों के प्रशस्त खिदमतें रोशन है। खास तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य के जुल्म व सितम और गुलामी से निजात दिलाने और देशवासियों को आजादी के लहरों से आरास्ता कराने में इस्लामी मदरसों  और उनके लीडरों की कुर्बानियों के दास्तान स्वर्ण अक्षरों से लिखी जाने के काबिल है। वह इस्लामी मदरसों के जांबाज उलेमा-ए-किराम ही तो थें जिन्होंने आजादी की फूंक उसवक्त फूंका जब आम तौर पर दूसरे लोग ख्वाब ए गफलत में मस्त थे, आजादी की जरूरत और अहमियत से नादान और गुलामी के ऐहसास से भी बेखबर थें।

इस प्रोग्राम में मौलना अब्दुल वाहिद साहिब, शायर अशरफ बिलाली, मौलाना अमिल मिस्बाही, मुफ़्ती मुनज्ज़म साहब आदि मौजूद रहे।

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