डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान – ‘इस तरह से हैं मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग’

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डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं। ये आज सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। कोर्ट ने 1994 के इस मामले को पुनर्विचार के लिए भेजने से मना कर दिया। जस्टिस दीपक मिश्र और एक अन्य न्यायमूर्ति के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ राय देते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस नज़ीर ने मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न अंग बताया। किसी ने अभिन्न अंग होने या ना होने की नज़ीर नहीं पेश की। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं। लेकिन मामला साफ़ कर बताना चाहते हैं कि मस्जिद इस्लाम में क्यों ज़रूरी है। पाँच वक़्त की नमाज़ मस्जिद क़रीब ना होने पर कहीं भी पढ़ी जा सकती है। घर हो या खेत हो या दूसरी कोई साफ़ जगह। लेकिन जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का सवाब मतलब पुण्य इस्लाम में अधिक है। लिहाज़ा किसी भी धार्मिक व्यक्ति को अपने धर्म के हिसाब से अधिक से अधिक पुण्य कमाने से रोका नहीं जा सकता।

अब सबसे बड़ी बात कि मस्जिद अभिन्न अंग कैसे है। वो ऐसे है कि जुमे की नमाज़ बिना मस्जिद के नहीं पढ़ी जा सकती। वहीं पढ़ी जा सकती है जिस मस्जिद में जुमे की नमाज़ होती हो। हम अब भले पांच वक़्त या आमतौर पर नमाज़ नहीं पढ़ते लेकिन हमने अपने छात्र जीवन में कई बार इमामत की और नमाज़ पढ़ाई। वजह कि स्टूडेंट चाहते थे कि जुमे की नमाज़ कॉलेज में हो। हमने कॉलेज की छत पर नमाज़ पढ़ाई लेकिन ये भी बताया कि इसे नमाज़-ए-जुमा नहीं माना जाएगा। ये ज़ोहर की नमाज़ ही मानी जाएगी। क्योंकि जुमा मस्जिद में नहीं हो रही है। हम लोगों ने फिर जुमे के दिन बाहर जुमा मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाने देने की परमीशन कॉलेज से हासिल कर ली। ख़ैर। । यूँ तो जुमे के लिए अलग से कोई नीयत नहीं बाँधी जाती लेकिन नमाज़-ए-जुमा मस्जिद में ही पढ़ी जा सकती है। जैसे बहुत सी ख़वातीन घर पर जुमे के दिन ज़ोहर की नमाज़ पढ़ती हैं इसलिए उसे जुमा पढ़ना नहीं माना जाता।

मस्जिद एक ऐसा नियत स्थान है जहाँ मुसलमान इकट्ठा होकर नमाज़ की सफ़ें मतलब पंक्तियाँ बाँध सकें। इमामत हो सके, जुमा मस्जिद में जुमे के दिन ख़ुतबा हो सके। बिना ख़ुतबे के जुमा नहीं हो सकता। ये सब धार्मिक मसला है और इस्लाम का अभिन्न अंग है। हाँ, मस्जिद का कोई बहुत बुलंद इमारत होना ज़रूरी नहीं है। मस्जिद साधारण और कच्ची भी हो सकती है। शानदार और बड़ी मस्जिद मुसलमानों के आर्थिक स्तर पर निर्भर है। । तो ये बात मालूम होनी चाहिए कि नमाज़ के लिए मस्जिद कितनी ज़रूरी है। जहाँ जुमे की नमाज़ पढ़ाई जा रही हो वहाँ मस्जिद भर जाने पर भी जहाँ तक सफ़ बँध जाए वहाँ तक जुमे की नमाज़ अदा हुई मान ली जाती है।

हम मानते हैं कि किसी की राह रोक सड़क पर नमाज़ पढ़ना मुनासिब नहीं है। इसके लिए कई मंज़िला नई मस्जिदें बनानी चाहिए ताकि सभी लोग मस्जिद के भीतर नमाज़ पढ़ सकें। हर मुसलमान का फ़र्ज़ है कि रोज़ की पांच वक़्त की नमाज़ का वक़्त होने पर क़रीब की मस्जिद जाए, मस्जिद पास नहीं है तो भी नमाज़ कज़ा ना करे और जहाँ मौजूद है वहीं किसी पाक जगह पर नमाज़ पढ़ ले। लेकिन ऐसी जगह पढ़े कि किसी को तकलीफ़ ना हो। किसी की राह ना रूके। किसी का कोई हर्जा ना हो। हाँ, अगर नमाज़ पढ़ते मुसलमान को देखकर किसी को यूँ ही मरोड़ उठे या चिढ़ पैदा हो तो वो बात ही अलग है। ऐसा बहुतों के साथ होता है। ऐसी बेवजह की मरोड़ उठना ग़ैरज़रूरी है।

हिंदोस्तान की बहुसंख्यक जनता कहीं भी शांति से नमाज़ पढ़ते मुसलमान को सम्मान से ही देखती है। मस्जिद इस्लाम का कैसे अभिन्न हिस्सा है ये नमाज़-ए-जुमा मस्जिद में पढ़ना ज़रूरी होने और रोज़ की नमाज़ मस्जिद में जमात के साथ पढ़ने के सवाब मतलब पुण्य की बात से साफ़ पता चलता है।

(ये लेखक के निजी विचार है। उपरोक्त विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं।)

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