गांधी ने मुसलमानों की जिस रिवायत की तारीफ़ की थी, वो अब मुसलमानों में नहीं रही

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डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

महात्मा गाँधी ने मुसलमानों की जिस रिवायत की तारीफ़ की थी, वो अब मुसलमानों में नहीं रही। दरअसल गाँधीजी को एक कार्यक्रम में कानपुर आना था। अली ब्रदर्स को भी आना था। अली ब्रदर्स मतलब मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौक़त अली पहले पहुँच गए।

लोगों ने अली ब्रदर्स के सम्मान में जुलूस निकाला और एक बग्घी पर अली ब्रदर्स को बैठाकर जुलूस लेकर चले। तभी भीड़-भाड़ से अली ब्रदर्स की बग्घी का घोड़ा भड़क गया और उसने अपनी टांगें उठाकर सामने खड़े अब्दुल हफ़ीज़ नाम के नौजवान के सीने पर दे मारीं।

हट्टा-कट्टा और ख़ूबसूरत नौजवान मौके पर ही चल बसा। अब अली ब्रदर्स ने उस नौजवान की लाश को कंधा दिया और काफ़ी दूर तक पैदल लेकर गए। तभी गाँधीजी कानपुर पहुँच गए। गाँधीजी को जब नौजवान की मौत के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने कहा कि मेरे सम्मान में ना कोई नारेबाज़ी हो और ना ढोल-ताशा बजाया जाए। मुझे उस नौजवान के पास ले चलो।

गाँधीजी पहुँचे तो देखा अली ब्रदर्स नौजवान की लाश के पास खड़े हैं, बहुत से मुसलमान जनाज़े को घेरे हैं, नौजवान के घरवाले भी मौजूद हैं लेकिन कोई रोना-पीटना या क्रंदन नहीं हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे अपने सो रहे परिजन के इर्द-गिर्द खड़े लोग उसे निहार रहे हैं।

गाँधीजी ने कहा कि होना तो ये चाहिए कि हिंदुओं में मौत का डर नहीं होना चाहिए और आत्मा निकलने के बाद विलाप नहीं होना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं है। मुसलमानों में मौत का डर नहीं होता और मौत पर ऐसा रोना-पीटना नहीं होता है जैसा हिंदुओं में होता है।

ख़ैर। गाँधीजी ने जो कहा था वो उस दौर में सही था। आज के दौर में मुसलमान की मौत के बाद हिंदुओं से कम रोना-धोना नहीं होता। जबकि इस्लाम में ये है कि मुर्दे के पास शोर ना करो। मुर्दे को तकलीफ़ होती है।

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