लोकसभा चुनाव: बिहार जैसी है मुस्लिमों की आबादी लेकिन मुसलमानों को झारखंड में कोई टिकट नहीं

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देश में मुसलमानों का एक तरह से सेक्युलर दलों की और से सियासी वजूद पूरी तरह से खत्म करने पर आमदा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण झारखंड राज्य है। जिसकी आबादी बिहार से सिर्फ दो फीसद कम है। लेकीन सेक्युलर दलों ने देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना भी जरूरी नहीं समझा।

इस बार झारखंड में चुनावी संघर्ष भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और महागठबंधन के बीच है। राजग में भाजपा के साथ ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) है। आजसू को गिरिडीह सीट दी गई है. वहीं,

वहीं महागठबंधन के भीतर कांग्रेस सात, जेएमएम चार और झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) को दो सीटें लड़ने के लिए मिली हैं। इनके अलावा पलामू सीट राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के हिस्से में गई है। हालांकि, इसके साथ चतरा सीट न मिलने पर राजद ने महागठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया है और यहां भी अपना उम्मीदवार उतार दिया है।

इन उम्मीदवारों के अलावा राजग और महागठबंधन की ओर से अब तक घोषित उम्मीदवारों में एक भी मुसलमान नहीं है। आगे भी इसकी संभावना न के बराबर ही है जबकि राज्य में इस समुदाय की आबादी करीब 15 फीसदी है। यानी झारखंड में हर सात में एक व्यक्ति इस समुदाय से आता है। इसके बावजूद संसद में इस समुदाय के प्रतिनिधि को भेजने के लिए कोई पार्टी तैयार नहीं दिख रही है।

बिहार में मुसलमानों की आबादी करीब 17 फीसदी यानी झारखंड से बस दो फीसदी ही ज्यादा है। लेकिन, मुसलमान प्रत्याशियों की संख्या पर ध्यान दें तो दोनों राज्यों में एक बड़ा अंतर दिखता है। बिहार में राजद ने चार, कांग्रेस ने दो और जदयू ने एक मुसलमान उम्मीदवार को चुनावी दंगल में उतारा है। पूरे देश में यदि इस समुदाय से उम्मीदवार खड़े करने की बात की जाए तो बाकी दलों के बीच राजद इस मामले में अव्वल है।

हालांकि झारखंड में महागठबंधन की ओर से इस समुदाय के मतदाताओं को यह आश्वासन देने की कोशिश की गई है कि किसी मुस्लिम को राज्यसभा भेजा जाएगा। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक पाकुड़ में मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक 35.8 फीसदी है। वहीं, साहेबगंज में यह आंकड़ा 34.6 फीसदी है। ये दोनों जिले राजमहल संसदीय क्षेत्र के तहत आते हैं। लेकिन इस सीट को अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए सुरक्षित घोषित किया गया है।

रांची स्थित एनजीओ ऑल मुस्लिम यूथ एसोसिएशन (आम्या) के अध्यक्ष एस अली सत्याग्रह को बताते हैं, ‘हम लोगों ने लोकसभा चुनाव में मुसलमान नेताओं को टिकट देने को लेकर सभी प्रमुख पार्टियों को पत्र भी लिखा था। सभी ने हमारी मांग पर विचार करने का भरोसा दिया लेकिन आखिर में न कह दिया।’ इस पत्र में राज्य की पांच सीटों- गोड्डा, चतरा, धनबाद, गिरिडीह और जमशेदपुर में से किन्हीं दो पर मुसलमान प्रत्याशी उतारने की मांग की गई थी।

एस अली कहते हैं, ‘मुसलमानों का वोट यूपीए (महागठबंधन) को जाता है. हम लोगों ने पार्टियों से कहा कि वोट मांगते हो लेकिन उम्मीदवार नहीं बनाते। ऐसा कैसे चलेगा?’ वे आगे कहते हैं, ‘दूसरा समुदाय मुसलमानों को वोट नहीं देता लेकिन, हमसे वोट मांगता है। जब राजमहल सीट पर चार लाख से अधिक मुसलमान आदिवासी को वोट कर रहा है तो गोड्डा में जो आदिवासी हैं, उनको तो (मुसलमानों के बारे में) सोचना पड़ेगा न?’

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