मुसलमानों का भाजपा से अलगाव मिथक टूटा, 45 मुस्लिम बहुल लोकसभा सीटें बीजेपी ने जीती

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भारतीय राजनीति में माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी में अनेक मुसलमान नेताओं के होते हुए भी भारत के आम मुसलमान भाजपा के पक्ष में मतदान नहीं करते। उससे दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। जिसके चलते भाजपा मुस्लिमों को टिकट देने में कतराती है।

लेकिन 2019 के लोकसभा के चुनावों में आये चुनाव परिणामों ने इस मिथक को ध्वस्त कर दिया है। लोकसभा चुनाव में 303 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत से दोबारा केंद्र की सत्ता पर काबिज होने वाली बीजेपी को देश भर kii 90 ‘अल्पसंख्यक बहुल’ जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक सीटें हासिल हुई हैं। इसके जरिए उसने अल्पसंख्यक विरोधी पार्टी बताने वाले विपक्ष के दावों को एक तरह से खारिज किया है। इन अल्पसंख्यक बहुल जिलों की पहचान 2008 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने की थी।

उदाहरण के लिए उ.प्र. की 80 लोकसभा सीटों में से 40 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 3 लाख से 9 लाख के मध्य है। लोकसभा की 15 से 20 लाख की मतदाताओं की किसी सीट पर किसी समुदाय विशेष की इतनी प्रभावी संख्या ‘निर्णायक मतदाताओं’ की श्रेणी में आती है।भाजपा ने 2019 के चुनावों में इन 40 लोकसभा सीटों में से 31 पर विजय पायी है।  उ.प्र. की 3 लाख से 3.75 लाख मुस्लिम मतदाताओंवाली भाजपा द्वारा विजित खीरी, धौरहरा, मोहनलालगंज, इलाहाबाद, फैजाबाद, कुशीनगर, गौतमबुद्धनगर, मिश्रिख व कानपुर जैसी सीटों से लेकर 4 से 5 लाख की मुस्लिम मतदाताओंवाली पीलीभीत, बागपत, बुलंदशहर, अलीगढ़, कैसरगंज, गौंडा, बाराबंकी, बदायूं, आंवला, लखनऊ, सीतापुर, शाहजहांपुर, संतकबीरनगर व महाराजगंज की भाजपा द्वारा जीती गयी।

मुस्लिम, यादव, जाट व अनुसूचित जाति को लक्ष्य कर किया गया सपा-बसपा-रालोद गठबंधन हालांकि 6.5 लाख से 9 लाख मुस्लिम मतदाताओं वाली मुरादाबाद, बिजनौर, रामपुर, संभल, मुरादाबाद, नगीना, श्रावस्ती व सहारनपुर जैसी 7 सीटें भाजपा से झटकने में कामयाब रहा है। किन्तु मुजफ्फरनगर की 6 लाख मुस्लिम मतदाताओं की सीट पर भाजपा के सांसद संजीव बालियान का राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह को पटखनी देना, कैराना जैसी 6.5 लाख मुस्लिम मतदाताओं वाली सीट से भाजपा प्रत्याशी की विजय, गाजियाबाद की 7 लाख मुस्लिम मतदाताओं की सीट से वीके सिंह की धमाकेदार मतों से विजय या बरेली से भाजपा के संतोष गंगवार की जीत इस मिथक के धराशायी होने की व्यखाया कर रही है।

इसके अलावा उत्तरप्रदेश में भाजपा द्वारा गंवाई 9 मुस्लिम मतदाता बहुल सीटों में से कई पर हार—जीत का अंतर इतना कम रहा है कि इन्हें भविष्य में अतिरिक्त मेहनत से आसानी से जीता जा सकता है। उदाहरण के रूप में श्रावस्ती व सहारनपुर की सीटों को लिया जा सकता है। जहां भाजपा प्रत्याशी न्यूनतम मतों से पराजित हुए हैं। स्पष्ट है कि कम से कम उ.प्र. की प्रभावी मुस्लिम मतदाताओंवाली लोकसभा सीटों पर या तो मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े प्रतिशत ने भी भाजपा को मतदान किया है।

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