महिला सशक्तिकरण की मिसाल – ‘मुमताज काजी’, एशिया की फर्स्ट डीजल इंजन मोटर वुमन

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पिछले 27 साल से मुंबई की लोकल ट्रेन को चलाने वाली मुमताज काजी महिला सशक्तीकरण की बड़ी मिसाल है। एशिया की पहली डीजल इंजन मोटरवुमन मुमताज 27 साल से मुंबई की लाइफलाइन यानी लोकल ट्रेन चला रही हैं। मुमताज अब इलेक्ट्रिक और डीजल दोनों इंजिनों पर हाथ आजमा रही हैं।

मुमताज अब तक मेयर पुरस्कार, जीएम अवॉर्ड, नारी शक्ति अवॉर्ड से सम्मानित हो चुकी हैं। उन्हें राष्ट्रपति के हाथों से भी अवॉर्ड मिल चुका है। मुमताज कहती हैं, ‘मेरे पिता ए.आई. काथावाला वेस्टर्न रेलवे में थे। बचपन से ही ट्रेन का हॉर्न और स्पीड मुझे आकर्षित करती थी। 1988 में मैंने विज्ञापन देखकर असिस्टेंट पायलट डीजल के लिए अप्लाई किया। 1991 में सारे एग्जाम पास करने के बाद जब मुझे इस पोस्ट के लिए बुलावा आया, तब तक मैं डीएमएलटी का कोर्स भी कर रही थी। मेरे पास पथॉलजी के फील्ड में जाने का ऑप्शन भी था, मगर मैं मोटरवुमन बनना चाहती थी। हम चार भाई-बहन थे। पिता प्रगतिशील विचारों के थे। मैंने डीजल इंजिन मोटरवुमन के रूप में शुरुआत की, मगर जल्द ही मैं इलेक्ट्रिक इंजिन भी चलाने लगी। कुछ लोग थे, जो कहते थे कि यह क्या ट्रेन चला पाएगी? मगर बहुतों ने सहयोग दिया।

उन्होने बताया, लोकल ट्रेन चलना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। ट्रेन 3 मिनट से ज्यादा लेट नहीं होनी चाहिए। आप कैब (इंजिन के पास) में अकेले होते हैं, इसलिए कई फैसले खुद लेने होते हैं। मुझे याद है, जब मैंने 2005 में लोकल ट्रेन चलानी शुरू की थी, तभी एक औरत ने मेरी ट्रेन के नीचे खुदकुशी कर ली थी। उसकी मौत के लिए मैं खुद को दोषी समझती रही और कई दिन तक सो नहीं पाई। वह मेरा पहला और आखिरी ऐक्सिडेंट था। मैं काम से पहले सफर की दुआ पढ़ती हूं।’

लोकल ट्रेन के अलावा, मुमताज पर घर की भी जिम्मेदारी है। वह बताती हैं, ‘मैं दो बच्चों की मां हूं। बेटे तौफीक ने 10वीं की परीक्षा दी है और बेटी फतीन 7वीं में आई है। ट्रेन चलाने के कारण रिश्ता देर से मिला। मेरे पिता पढ़ा-लिखा और नेक लड़का चाहते थे, जो इलेक्ट्रॉनिक इंजिनियर मकसूद अहमद काजी के रूप में मिले। घर और लोकल ट्रेन की चुनौतियां तो रहती हैं, लेकिन पति के सपॉर्ट से सब कर लेती हूं। सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती है, जब घंटों टॉइलट नहीं जा पाती। खास तौर से जब मैं मालगाड़ी चला रही हूं। ज्यादातर स्टेशनों पर लेडीज टॉइलेट की सुविधा नहीं है।

वहीं लोकल को चलाने में ताकत खूब लगती है, जब लीवर ऑन करना हो या हैंड ब्रेक लगाना हो। मुझे हमेशा एक भारी बैग अपने साथ रखना पड़ता है, जिसमें सेफ्टी टूल्स होते हैं। मेरे आने के 10 साल तक इस फील्ड में कोई लड़की नहीं थी। बाद में कुछ लड़कियां आईं, लेकिन रिस्की और जिम्मेदारी का काम मानकर उन्होंने डिपार्टमेंट ही बदल लिया। मैं महिलाओं से कहना चाहूंगी कि वे ठान लें, तो इस फील्ड में भी करियर बना सकती हैं, खासकर मुंबई में।’

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