जस्टिस कुरैशी का चीफ जस्टिस बनाना चाहता था कॉलेजियम, मोदी सरकार ने दूसरे को बनाया

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को सरकार ने दरकिनार कर दिया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने 10 मई को गुजरात की पैरंट हाई कोर्ट से सबसे वरिष्ठ जज एए कुरैशी के नाम पर सिफारिश की थी.

वहीं सरकार ने सिफारिश के विपरीत संविधान के आर्टिकल 223 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति की तरफ से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज रवि शंकर झा को चीफ जस्टिस के दायित्वों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त किया. इससे पहले कोलेजियम ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार सेठ के सेवानिवृत्त होने के बाद चीफ जस्टिस पद के लिए जस्टिस एए कुरैशी के नाम की सिफारिश की थी.

जस्टिस संजय कुमार सेठ 9 जून को रिटायर हो रहे हैं।  कोलेजियम ने देश की विभिन्न हाईकोर्ट के लिए 10 मई को तीन अन्य सिफारिशें भी की थी. गुजरात हाईकोर्ट के अवर न्यायाधीश को दिल्ली हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की गई है. उनकी नियुक्ति को केंद्र सरकार की तरफ से 22 जून को क्लियर कर दिया गया था.

इसके साथ ही कॉलेजियम ने मद्रास हाई कोर्ट से सबसे वरिष्ठ जज वी रामसुब्रमण्यम को पदोन्नति देते हुए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने पर सिफारिश की थी. इसके अलाव कॉलेजियम ने राजस्थान हाई कोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज आरएस चौहान को पदोन्नति देते हुए तेलंगाना हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की थी. जस्टिस चौहान फिलहाल तेलंगाना हाई कोर्ट में ही एक्टिंग चीफ जस्टिस के तौर पर कार्यरत हैं. सरकार ने इन दोनों ही सिफारिश पर अपना रुख अब तक स्पष्ट नहीं किया है.

एक कार्यक्रम के दौरान उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्ति के संबंध में पूछे गए एक सवाल पर कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा, “कानून मंत्री और कानून मंत्रालय दोनों की ही काफी महत्तवपूर्ण भूमिक होती है. हम केवल एक पोस्ट ऑफिस नहीं है. न्यायिक प्रक्रिया को पूरा सम्मान देते हुए हमें अपना काम करना होता है. हम माननीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सुझावों के साथ नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाने की कोशिश करेंगे.”

इससे पहले बीते साल नवंबर में जस्टिस कुरैशी का ट्रांसफर मुंबई हाई कोर्ट कर दिया गया था. जिसके बाद गुजरात हाई कोर्ट के सदस्यों ने इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किए. गुजरात हाई कोर्ट एवोकेट एशोसिएशन (जीएचएए) ने प्रस्ताव जारी करते हुए कहा,”हमें लगता है कि इस तरह से ट्रांसफर किया जाना गलत है. यह प्रशासन में सुधार की नीयत से नहीं किया गया है और यह न्यायिक प्रक्रिया को गहरा धक्का है.”

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