कोरोना काल में अधिकांश शिक्षा बोर्ड ने बची हुई परीक्षाएं न कराते हुए छात्रों को पिछले प्रदर्शन के आधार पर प्रमोट किया है. वहीँ, उच्च शिक्षा वाले छात्रों के लिए भी यही सहूलियत की गयी कि उन्हें पिछले वर्षों के प्रदर्शन और इंटरनल असाइनमेंट के आधार पर अगले सेमेस्टर/वर्ष में प्रमोट किया जाये. लेकिन डिग्री कोर्सेज़ के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए ये बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी जब यूजीसी ने हर हाल में देश भर में अंतिम वर्ष के छात्रों की परीक्षा अनिवार्य रूप से कराने के बाबत गाइडलाइन्स जारी कीं. इस बात को लेकर काफी बवाल मचा हुआ है. कई जगह छात्र इसके वि’रोध में ध’रने-प्र’दर्शन और भूख हड़’ताल भी कर रहे हैं. छात्रों समेत उनके अभिभावक, शिक्षक और नॉन-टीचिंग स्टाफ भी अंतिम वर्ष की परीक्षाएं रद्द करने के पक्ष में हैं. अब इस विषय में यूजीसी का हालिया आदेश रद्द करने की मांग को लेकर सुप्रीम को’र्ट में याचिका दायर की गई है.

दस से अधिक छात्रों ने यूजीसी के छह जुलाई के दिशानिदेर्शों को शीर्ष अदालत में चुनौती देते हुए याचिका दायर की है. इन याचिकाकर्ता छात्रों में एक कोरोना पीड़ित भी है. याचिकाकतार्ओं का कहना है कि ऐसे अंतिम वर्ष के कई छात्र हैं जो या तो खुद कोरोना संक्रमण के शिकार हैं या उनके परिवार के सदस्य इस महामा’री की चपेट में हैं. ऐसे छात्रों को इस वर्ष 3० सितंबर तक अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में बैठने के लिए मजबूर करना, अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार का खुला उल्लंघन है. वकील अलख आलोक श्रीवास्तव के माध्यम से दायर याचिका में दावा किया गया है कि आमतौर पर 31 जुलाई तक छात्रों को अंक प्रमाण पत्र/ डिग्री प्रदान की जाती है, जबकि वर्तमान मामले में परीक्षाएं 30 सितंबर तक समाप्त होंगी. याचिकाकर्ता दलील है कि जब विभिन्न शिक्षा बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं रद्द करके आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम घोषित किए जा सकते हैं तो अंतिम वर्ष के छात्रों का क्यों नहीं?