कोरोना वायरस महामा’री के दौरान देश भर में विश्वविद्यालयों में आखिरी साल की परीक्षाएं आयोजित कराने के यूजीसी के फैसले पर विवा’द बढ़ता ही जा रहा है. जहाँ, एक ओर विद्यार्थी, शिक्षक, अभिभावक इस फैसले के खि’लाफ हैं, वहीँ यूजीसी हर हाल में परीक्षाएं आयोजित कराने पर आमादा है. फिलहाल यह मामला सुप्रीम को’र्ट में है, जहाँ आज की सुनवाई में सुप्रीम को’र्ट ने अगली सुनवाई के लिए 18 अगस्त की डेट दे दी है. न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई शुक्रवार को सुबह 10:30 बजे शुरू की और यह 1 बजे तक चली. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने शीर्ष अदा’लत से कहा है कि फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स की हेल्थ भी उतनी ही अहमियत रखती है जितना अन्य बैच के विद्यार्थियों का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है. सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने कहा कि इन दिनों स्टूडेंट्स को ट्रांसपोर्टेशन व कम्युनिकेशन से जुड़ी काफी दिक्कतें आ रही हैं. महाराष्ट्र के कई कॉलेज क्वारंटाइन केंद्र के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

एक अन्य याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि देश भर के कॉलेजों में एक जैसी सुविधाएं नहीं हो सकतीं. कई कॉलेजों में कक्षाएं ही नहीं लगी हैं. दिल्ली और महाराष्ट्र की सरकारों ने परीक्षा रद्द करने का फैसला लेने से पहले अपने विश्वविद्यालयों के वीसी से सलाह मशविरा किया था जिन्होंने कहा था कि देश के कई शहरों, गावों, कस्बों में आज भी ऐसे इन्टरनेट कनेक्शन नहीं है, जिससे विद्यार्थी निर्बाध डिजिटल क्लास अटेंड कर सकें या ऑनलाइन परीक्षाएं दे सकें. सिंघवी ने कहा कि यूजीसी के 15 अप्रैल, 1 मई व 29 जून के दिशा-निर्देशों में कोविड-19 की महामा’री की गंभीरता को समझा गया और विश्वविद्यालयों को परीक्षा कराने या न कराने की ढील दी गई थी. लेकिन अब, जबकि संक्रमण के मामले पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गये हैं और लगातार तेज़ी से बढ़ते ही जा रहे हैं तो यूजीसी आखिर कैसे परीक्षा कराना अनिवार्य कर सकता है, वो भी तब जब कॉलेजों में पढ़ाई हुई ही न हो.

यूजीसी ने कहा कि छह जुलाई को उसके द्वारा जारी दिशा-निर्देश विशेषज्ञों की सिफारिश पर अधारित हैं और उचित विचार-विमर्श कर यह निर्णय लिया गया. आयोग ने कहा कि यह दावा गलत है कि दिशा-निर्देशों के अनुसार अंतिम परीक्षा कराना संभव नहीं है. पूर्व में महाराष्ट्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे पर जवाब देते हुए यूजीसी ने कहा कि महाराष्ट्र का हलफनामा उसके अपने ही दावे के विपरीत है कि मौजूदा परिस्थितियां कथित तौर पर ऐसी हैं कि विश्वविद्यालय एवं संस्थान अंतिम वर्ष की परीक्षा भी नहीं करा सकते हैं. ऐसे में कथित परिस्थितियां अगला शैक्षणिक सत्र शुरू करने से भी रोकती हैं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 10 अगस्त को शीर्ष अदा’लत से कहा कि राज्य सरकारें आयोग के नियमों को नहीं बदल सकती हैं, क्योंकि यूजीसी ही डिग्री देने के नियम तय करने के लिए अधिकृत है. मेहता ने न्यायालय को बताया कि करीब 800 विश्वविद्यालयों में से 290 में परीक्षाएं संपन्न हो चुकी है जबकि 390 परीक्षा कराने की प्रक्रिया में हैं.